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सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर शिक्षा के आरक्षण पर चलाई कटार, बताया इसे संविधान की मूल भावना के विपरीत

आशुतोष शुक्ला ( नई दिल्ली). वर्तमान में आरक्षण एक ऐसा विषय है जो सीधे तौर पर शिक्षा और जीविका पर चोट करता है . शायद इसीलिए विद्यार्थियों और प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग लेने वाले छात्रों के लिए यह सदा ही चर्चा का विषय रहता है. आरक्षण जैसे चुनौतीपूर्ण विषय पर सीधी टिप्पणी करते हुए उच्चतम न्यायालय ने इसके समाधान के लिए राजनैतिक इच्छाशक्ति के होने को बहुत ही कठिन परंतु आवश्यक बताया है.

आरक्षण पर बोलते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इसके लाभ के वास्तविक हकदारों की सूची की ना ही समीक्षा की गई और ना ही आरक्षण का प्रावधान खत्म हुआ है.

शीर्ष अदालत ने अपने एक फैसले में टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार को आरक्षण की पात्रता वाली सूचियों में संशोधन करने की जरूरत है. ताकि आरक्षण का लाभ जरूरतमंदों तक और अंतिम छोर में खड़े हुए व्यक्ति तक पहुंच सके जो इसके लिए वास्तव में अधिकारी है. न्यायाधीश अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने गत मंगलवार को सुनाए गए अपने फैसले में कहा कि अन्य पिछड़े वर्गों अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के साथ हुए भेदभाव के कारण आरक्षण का प्रावधान किया गया. संविधान पीठ ने कहा कि यह परिकल्पना की गई थी कि 10 साल के भीतर सामाजिक विसंगतियों आर्थिक असमानता और पिछड़ेपन को समाप्त कर दिया जाना चाहिए, लेकिन समय-समय पर संशोधन किए गए लेकिन सूचियों की ना तो समीक्षा की गई और ना ही आरक्षण के प्रावधान को खत्म किया गया.

इसके आगे कहा कि इसकी बजाय इसे बढ़ाने और आरक्षण के भीतर भी आरक्षण देने की मांग हो रही है. कोर्ट ने आदिवासी इलाके के स्कूलों में शिक्षकों के 100 फीसद पद अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित करने के जनवरी 2000 के आंध्र प्रदेश का आदेश निरस्त करते हुए अपने 152 पेज के फैसले में यह टिप्पणियां की.

इस पीठ में जस्टिस अरुण मिश्रा के अलावा, जस्टिस इंदिरा बैनर्जी, विनीत सरन, आशा, और अनिरुद्ध बोस भी शामिल थे.

कोर्ट ने कहा कि यह माना है और संविधान के अंतर्गत इसकी इजाजत भी नहीं है. पीठ ने कहा कि 100 फ़ीसदी आरक्षण प्रदान करना अनुचित होगा. कोई भी कानूनी अनुमति नहीं देता कि अनुसूचित जाति इलाकों में सिर्फ आदिवासी शिक्षक ही पढ़ाएंगे. इससे अतिशय परिश्रम करके ऊपर उठने का प्रयास करने वाले शिक्षार्थियों का मनोबल भी प्रभावित होता है.

तात्विक दृष्टि से देखें तो तीन मुख्य मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट ने सीधी चोट की है. जिन लोगों को इसका लाभ मिल चुका है, उन्हें लाभ देने के बाद से ना तो सूचियां संशोधित हुई ना आरक्षण खत्म हुआ. जिन्हें वास्तव में इसकी आवश्यकता है उन तक लाभ पहुंचने के लिए पात्रता सूची में संशोधन आवश्यक है. कोई कानून सौ फ़ीसदी आरक्षण देने की अनुमति नहीं देता है.

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