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इंटरनेट के दौर में भी किताबें हो सकती है बेहतरीन दोस्त, जानें कैसे

नई दिल्ली. वक्त मुसीबत का हो या अकेलेपन का किताबों से मिलने वाले विचार हमें हर चुनौती से लड़ने की सामर्थ्य देते हैं और वक्त गुजारने की हिम्मत भी लॉक डाउन के 40 दिन बीत चुके हैं। किताबें पढ़ने के शौकीन इस वक्त को बेशकीमती मांगते हुए अपनी पसंदीदा किताबों में रमे रहते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इंटरनेट सर्फिंग के मुकाबले किताबें पढ़ना पढ़ते हुए वक्त गुजारना ज्यादा महत्वपूर्ण होता है और किताबें मनोबल बढ़ाती हैं l

सेहत के मददगार
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय प्रेस के अध्ययन के मुताबिक किसी रोचक या चुनौतीपूर्ण भाषा को पढ़ने से मस्तिष्क को ऊर्जा मिलती है जो हमारी मानसिक सेहत के लिए लाभदायक है। यह अध्ययन कहता है कि किताब पढ़ना एक तरह की थेरेपी जैसा है जिसे दवा ना भी माना जाए तो दवा के असर में इजाफा करने वाला तो कहा ही जाएगा इस थेरेपी का असर दीर्घकालिक है।

उम्र बढ़ाएं की पढ़ने की आदत
यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ ने 2016 के अध्ययन में पाया कि जिन लोगों को रोज पढ़ने की आदत होती है। वह न पड़ने वालों के मुकाबले लंबा जीते हैं। इसका कारण पाया गया कि पढ़ने की आदत के विकसित होने के 12 साल बाद ऐसे लोगों में मृत्यु के खतरे 20% तक घट जाते हैं। अध्ययन कर्ताओं ने पाया कि किताबें ना पढ़ने वाले लोग ज्यादा तनाव व रोग ग्रस्त रहते हैं। जिससे मृत्यु होने के खतरे ज्यादा रहते हैं।

कल्पनाओं की सैर जरूरी
लॉक डाउन जैसे दौर में हम हर वक्त तनाव महसूस करते हैं जो कि खतरनाक रूप से रूप ले सकता है। ऐसे में जरूरी है कि हम खुद को कुछ देर के लिए उस दुनिया में ले जाएं। जहां आपके सपनों और कल्पनाओं का संसार हो। न्यूयॉर्क के द न्यू स्कूल फॉर सोशल रिसर्च के निष्कर्ष है कि फिक्शन स्टोरी या काल्पनिक उपन्यास पढ़ने से हम कुछ देर के लिए हाल की समस्याओं से दूर हो जाते हैं जो हमारे अंदर की नई ऊर्जा का संचार करता है। थ्योरी ऑफ ओपन माइंड, कल्पनाशीलता को क्षमता प्रदान करते हैं जिससे हम अपने व्यक्तित्व के ही नए तरह के विचारों की ओर ध्यान दे पाते हैं।

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