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नींव ने पराली से उत्पन्न प्रदूषण और रोकथाम की जागरुकता को आयोजित किया राष्ट्रीय वेबिनार

नई दिल्ली : आईआईटी दिल्ली के पुरातन छात्र छात्राओं द्वारा संचालित सामाजिक संस्था, नींव द्वारा “पराली से उत्पन्न प्रदूषण, रोकथाम व उसका उपयोग” विषय पर एक राष्ट्रीय वेबिनार आयोजित किया गया। जिसमें देश विदेश से करीब 1000 से अधिक प्रतिभागियों ने प्रतिभाग किया व इस कार्यक्रम का सजीव प्रसारण यूट्यूब, फेसबुक, ट्विटर और लिंकेडीन के द्वारा भी किया गया।

गावों में बच्चों के लिए नींव-विद्या डिजिटल प्लेटफार्म विकसित –
कार्यक्रम का आरम्भ नीव संस्थान के राष्ट्रीय समन्वयक डॉ0 उपदेश वर्मा जी द्वारा किया गया। उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष जब दिल्ली में प्रदुषण खतरनाक रूप से बढ़ गया तो नींव संस्था व आईआईटी दिल्ली के एलुमनाई ने दिल्ली के चीफ मिनिस्टर से मुलाकात करके पराली को जलाने के बजाय उससे एग्रो बोर्ड बनाने का सुझाव दिया था, जिससे पराली जलने से जो प्रदुषण होता है उससे भी निजात मिल जाएगी। उन्होंने नींव संस्था द्वारा कोविड के दौरान किये गए कार्यों जैसे गरीबो को भोजन प्रदान करना, मास्क बांटना, जागरूकता फैलाना के लिए वेबिनार करना व गरीब झुग्गी व गावों में रहने वाले बच्चों के लिए नींव-विद्या डिजिटल प्लेटफार्म को विकसित करना आदि प्रमुख थे।

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प्रति कुलपति चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ मुख्य अतिथि रही –
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि प्रोफेसर वाई विमला जी, प्रति कुलपति चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ रही, उन्होंने बताया की प्रदुषण केवल पराली से उत्पन्न नहीं होता बल्कि रोज हम भोजन बनाने के लिए चूल्हा जलाते है व और लोकल कूड़ा जलने, फैक्ट्री की चिमनियों से, वाहनों की लगातार बढ़ती हुई संख्या से जो प्रदुषण से होता है वो पूरे वर्ष लगातार ही होता है। सरकार को और आम जनता को ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाकर इसकी रोकथाम करनी चाहिए।

खराब वायु गुणवत्ता में इनका भी होता है योगदान –
डॉ गीतांजलि जो की नीव संस्था की सचिव है उन्होंने बताया कि लगभग 178 मिलियन टन अधिशेष फसल अवशेष देश में उपलब्ध हैं। देश में चावल, गेहूं, गन्ना ,कपास, मक्का, सोयाबीन, सरसों के विभिन्न फसल फसल अवशेषों में अनुमानित 87 मीट्रिक टन फसलें जला दी जाती हैं। जले हुए कुल अवशेषों में से चावल 40%, गेहूं 22%, और गन्ना 20% और कपास कुल जला हुआ 8%, दिल्ली की खराब वायु गुणवत्ता में इसका योगदान 25% से 30% के बीच अनुमानित है।

ऑनलाइन पोर्टल के राष्ट्रीय कोऑर्डिनेटर ने कहा –
डॉ संजीव कुमार श्रीवास्तव, जो कि प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा संचालित आई -स्टेम (I -STEM) ऑनलाइन पोर्टल के राष्ट्रीय कोऑर्डिनेटर है उन्होंने बताया कि ISTEM प्लेटफ़ॉर्म को माननीय पीएम द्वारा विज्ञान कांग्रेस में जनवरी, 2020 के दौरान शुरू किया गया। परली जलने जैसे क्षेत्रीय मुद्दों के प्रति जागरूकता पैदा करने और जनता को इस क्षेत्र और प्रसिद्ध क्षेत्र के विशेषज्ञों की विशेषज्ञता का उपयोग करने की अनुमति देने के लिए ISTEM द्वारा उठाए गए विभिन्न पहलुओं के बारे में विस्तार से अवगत करवाया।

खेती को 50% कृषि भूमि तक सीमित करने की आवश्यकता –
डॉ एस के त्यागी जो के सेवानिवृत अपर निदेशक सेंट्रल पोल्लुशण कण्ट्रोल बोर्ड रहे है उन्होंने सिफारिश की कि हमें चावल की खेती को 50% कृषि भूमि तक सीमित करने की आवश्यकता है जो वर्तमान में 85-90% है, इससे पानी की मेज को और नीचे जाने से रोक दिया जाएगा। न्यूनतम स्टैक की ऊंचाई वर्तमान 30 मीटर से 50 मीटर होनी चाहिए। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि पराली जलाने के मुद्दे से निपटने में एयर शेड प्रबंधन की प्राथमिकता होनी चाहिए।

डॉ गीतांजलि कौशिक ने कार्यक्रम के अंत में सभी का धन्यवाद किया। इस अवसर पर नीव संस्था के जॉइंट सेक्रेटरी डॉ विजय तिवारी, दुर्गेश, प्रशांत, नम्रता , कौशल, ज्योत्स्ना, हरीश, अनिल, मनीष मिश्रा, डॉ सचिन, डॉ मनोज कुमार इत्यादि भी उपस्थित रहे व अपने विचार व्यक्त किये।

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