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शास्त्रीय संगीत में आजीविका के बढ़ते अवसर

युगों-युगों से मानव अपनी भावनाओं को कला के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। संगीत को हम पीढ़ी दर पीढ़ी सीखते हुये संरक्षित करते हुये शास्त्रीय संगीत की मधुर गुणवत्ता को बरकरार रखे हैं। लिखित इतिहास से पहले से भी भारत में संगीत की समृद्ध परम्परा रही है, इसका प्रयोग भजनों और मंत्रो के उच्चारण, ईश्वर की पूजा और अर्चना की शैली में किया जाता रहा है। प्रचीन काल से आधुनिक युग में आते-जाते संगीत की शैली व पद्धति में जबरदस्त परिवर्तन हुआ है।

आमतौर पर यही माना जाता है कि संगीत को कैरियर का आधार बनाकर ज्यादा कुछ करने की संभावनाये सीमित हो जाती है पर वास्तविकता की बात करे तो आज के संदर्भ में स्थितियां भिन्न है और तमाम नये विकल्प सामने आ रहे है। संगीत अब केवल शौक नही रहा बल्कि यह एक व्यवसाय के रूप में विकसित हो गया है।

’’अर्थ मूल्यम् कार्यम्’’ (चाणक्य)

अर्थात् सभी कार्यो की सिद्धि के लिये धन की आवश्यकता होती है। तेजी से बदलते परिदृश्य में संगीत का क्षेत्र एक महत्वपूर्ण व्यवसाय बन गया है। युवाओं में इस क्षेत्र का रूझान तेजी से बढ़ रहा है। संगीत को अपना कैरियर बनाने की इच्छा रखने वाले सृजनात्मक प्रतिभा का धनी, धुन का पक्का, मेहनती होने के साथ-साथ वाद्ययंत्रों का जानकार होना आवश्यक है। आधुनिक युग में सामान्य जीवन इतना जटिल हो चुका है कि दैनिक जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु कोई न कोई कार्य अवश्य करना पड़ता है। संगीत साधना में रत व्यक्ति को भी इन्ही कारणों से जीविकोर्पाजन करना अत्यावश्यक होता है। संगीत जिस अपना महत्व है। संगीत में व्यवसाय के विषय में कहा जा सकता है कि संगीत कला को आजीविका का माध्यम बनाकर शिक्षा द्वारा प्रदर्शन द्वारा एवं लेखन द्वारा उसको सुरक्षित रखना एवं जीवन निर्वाह करना है।

हमारे प्राचीन शास्त्रों एवं वेदों में संगीत को व्यवसाय के रूप में देखने से सम्बन्धित प्रमाण मिलते है अर्थात् वैदिक काल से ही मनीषीगण संगीत को व्यवसाय अथवा रोजगार के रूप में प्रयोग करते थे। तैत्तिरीय ब्राहा्रण में उल्लिखित है-

’’वीणावादक गणक गीताय’’
अर्थात् वीणावादन के साथ हाथ से ताली देने वाले (गणक) भी नियुक्त किये जाते थे। एक अन्य स्थान पर तैत्तिरीय ब्राहा्रण में कहा गया है-
’’अनो युक्ते च शते च ददाति’’
अर्थात् कलाकार को सौ बैलगाड़ी भरकर दृव्य देते थे।

पहले गुरू मुख से ही संगीत शिक्षा सीखी जाती थी –

सर्वप्रथम संगीत सीखने वाले जिज्ञासु के लिये उचित शिक्षा एवं मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में शिक्षक का महत्व देवताओं के समान माना जाता रहा है। सबसे महत्वपूर्ण रोजगार, शिक्षा के क्षेत्र में ही है। पहले गुरू मुख से ही संगीत शिक्षा सीखी जाती थी किन्तु जैसे-जैसे शिक्षा का स्वरूप बदलता गया उसी प्रकार संगीत के गुरूओं का स्वरूप भी बदलता गया। अब स्कूल, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय एवं प्रशिक्षण संस्थाओं में संगीत की शिक्षा होती है।

इस प्रकार हम देखते है कि शिक्षण के क्षेत्र में रोजगार के अनेकों अवसर है इसके अंतर्गत विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालयों के अलावा, संगीत संस्थाएं स्वतंत्र रूप से सिखाना एवं गुरू-शिष्य परम्परा आती है। जहां टेंनिग के साथ ही स्नातक, परास्नतक, विशेष डिप्लोमा सर्टिफिकेट पाठ्यक्रमों एवं पार्टटटाइम सीखने जैसे कई पाठ्यक्रमों चलते है और स्कूली बच्चों और युवाओं से लेकर हम उम्र के लोगों के लिये उपलब्ध है। संगीत शिक्षक के रूप में स्कूल, काॅलेज और अन्य प्रशिक्षण संस्थाओं में कैरियर बनाया जा सकता है।

मंच प्रदर्शन को भी तीन श्रेणियों में रख सकते है –

मंच प्रदर्शन कलाकार और श्रोता के मध्य एक महत्वपूर्ण कड़ी है। मंच प्रदर्शन द्वारा कलाकर अपनी कला का प्रदर्शन करके श्रोताओं को आनन्दित करता ही है तथा इसके साथ ही पर्याप्त धन भी प्राप्त कर लेता है, इस प्रकार मंच प्रदर्शन को भी तीन श्रेणियों में रख सकते है- 1. शास्त्रीय संगीत,
2. सुगम संगीत एवं
3. लोक गीत।

भारत वर्ष में अनेक संगीत सम्मेलन के आयोजन किये जाते है जहां कलाकारों को सम्मान एवं पारिश्रमिक भी प्रदान किया जाता है। इन संगीत सम्मेलनों का उद्देश्य शास्त्रीय संगीत को आगे बढ़ाना व प्रचार-प्रसार का होता है। मंच प्रदर्शन ही बहुत से कलाकारों की आजीविका का साधन है, जिससे उन्हें प्रस्तुति के आनन्द के साथ ही धनोपार्जन भी होता है।

हर विद्यार्थी का सपना होता है कि वह फिल्म उद्योग अर्थात् बाॅलीवुड में स्थान पायें –

  • फिल्म उद्योग अर्थात् चित्रपट संगीत ने भी गायकों को पाश्र्वगायन के लिये एक अत्यन्त विस्तृत क्षेत्र प्रदान किया है, जिससे यश के साथ-साथ धनप्राप्ति भी भरपूर होती है। आधुनिक समय में शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेने वाला हर विद्यार्थी का सपना होता है कि वह फिल्म उद्योग अर्थात् बाॅलीवुड में स्थान प्राप्त कर सके।
  • विभिन्न अवसरों के अनुसार लिखे गये छन्द व लय युक्त गीत ही किसी भी कार्यक्रम को सफल बनाने में सक्षम होते है। इस विद्या का जानकार गीतकार और लेखक फिल्म, दूरदर्शन, धारावाहिक और विज्ञापन आदि के लिये गीत लिखकर धन अर्जित कर सकता है।
  • संगीत की लय ताल बद्ध रचना को तैयार करने के लिये संगीत निर्देशन की आवश्यकता होती है। संगीत स्थित गीत को धुन, वाद्ययंत्रों के द्वारा सुव्यवस्थित करके पेश करना ही संगीत निर्देशन कहलाता है। निर्देशन हेतु मुख्य क्षेत्र स्कूल, काॅलेज, विश्वविद्यालय, नाटक, वृन्दगान, दूरदर्शन, आकाशवाणी, चित्रपट आदि है। यह भी शास्त्रीय संगीत में रोजगार की दृष्टि से एक सफल स्थान है।
  • संगीत चिकित्सा एक नई विद्या है जो आजकल तेजी से लोकप्रिय हो रही है। विकलांगता के शिकार लोगों के अलावा मानसिक व्याधि से ग्रस्त व्यक्तियों के उपचार में शास्त्रीय संगीत बढ़-चढ़कर भूमिका निभा रहा है। इसके लिये संगीत की शिक्षा और चिकित्सा का जानकार होना जरूरी है। शास्त्रीय संगीत को समझने वाला अस्पताल एवं मानसिक चिकित्सालयों में रोजगार प्राप्त कर सकता है।
  • प्रकाशक, आलोचक, समीक्षक भी एक अन्य क्षेत्र है। संगीत के प्रचार-प्रसार हेतु अनेकों संगीत की पत्रिकायें प्रकाशित होती है, जिनमें शास्त्रीय संगीत विषयक लेख एवं समाचार प्रकाशित हेाते है। संगीत में शास्त्रकारों का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। शास्त्रों द्वारा संगीत लेखक धन प्राप्त कर पाने में समर्थ हो जाता है।
  • हम प्रोग्राम की प्रस्तुति हेतु मंच आवश्यक है। मंच गीत और नृत्य के अनुरूप बनाना आवश्यक होता है, अर्थात् संगीत की समुचित जानकारी रखने वाला मंच सज्जा कार्य में सफल सिद्ध हो सकता है।
  • मंच सज्जा के साथ ही रूप सज्जा, वस्त्र सज्जा एवं आभूषण सज्जा भी किसी कार्यक्रम की सफलता हेतु अत्यन्त आवश्यक है, अतः इस क्षेत्र में भी रोजगार के असीमित अवसर है। संगीत का ज्ञाता ही कार्यक्रम के अनुरूप हर सज्जा को सही दिशा देने में सक्षम होकर, व्यवसाय के रूप में अपना सकता है।


संगीत का ज्ञाता अपना कैरियर बनाने में हो सकता है सक्षम –

मंच सज्जा के साथ ही ध्वनि यंत्रो की भी विशेष भूमिका होती है, किसी भी प्रदर्शन की सफलता के लिये ध्वन्यकन की तकनीक विषय भी एक अलग विद्या है, जिसमें संगीत का ज्ञाता अपना कैरियर बनाने में सक्षम हो सकता है। जिसको बोल-चाल की भाषा में Music Arramger कहते हैं। रिकाडर््स, कैंसेट्स, सीडीज, माइक्रोफोन, साउड सिस्टम, कम्प्यूटर इत्यादि। इन सबकी सहायता से संगीत सहज सुलभ है, कोई भी कही भी इन सब संसाधनों के द्वारा संगीत सुन और देख सकता है, इनसे इन उपकरणों को बनाने व बेचने वालो को भी संगीत का ज्ञान आवश्यक है, जिसके द्वारा उनको व कलाकारों को भी धन प्राप्ति होती है।

संगीत की हर विद्या अर्थात् गायन, वादन व नृत्य तीनों में वाद्यों का समुचित प्रयोग आवश्यक होता है। वाद्यों के निर्माण के अभाव में संगीत की कल्पना भी नहीं की जा सकती, वाद्य एवं वाद्य निर्माण कला में युवा आगे बढ़कर रूचि ले रहे हैं, वाद्य निर्माण एक उत्कृष्ट व्यवसाय है और संगीत समझने वाला ही इस कार्य में सफल होता है, क्योंकि उसको हर वाद्यों की उपयोगिता उनके स्वरों का पूर्ण ज्ञान होता है। वाद्यों का निर्माण करना व विक्रय करना दोनों ही सफल व्यवसाय हो सकते है।

दूरदर्शन व आकाशवाणी अपने आप में संगीत का सशक्त माध्यम –

दूरदर्शन एवं आकाशवाणी के महत्व को अनदेखा नहीं किया जा सकता, दोनों से ही कलाकार को नाम व धन प्राप्ति होती है। दूरदर्शन व आकाशवाणी अपने आप में संगीत का सशक्त माध्यम हैं इसमें साउंड रिकार्डिस्ट, एडिटर, प्रोडक्शन, आ0जे0, म्यूजिक साफटवेयर, प्रोग्रामर, कंपोजर, म्यूजिक स्टूडिया आदि के कार्य संलग्न होते है, जिसमें व्यवसाय की असीमित संभावनाएं हैं।

टी0वी0 पर बढ़ते रियलटीज शोज और स्टेज परफाॅर्मेन्स में अपने आप को मजबूत करने के लिये बच्चे और युवा शास्त्रीय संगीत सीख रहे है, क्योंकि हर तरह के संगीत का आधार शास्त्रीय संगीत है, क्योंकि शास्त्रीय संगीत से स्वर, ताल एवं भाव पक्ष तीनों ही मजबूत होते हैं।

किसी भी लिहाज से स्वान्तः सुखाय और मनोंरजन का साधन भर नहीं शास्त्रीय संगीत –

इस प्रकार हम कह सकते है कि वर्तमान समय में शास्त्रीय संगीत का व्यवसायिक क्षेत्र भी अत्यन्त विस्तृत है। रोजगार की सम्भावनायें अनेकों रूप में उपलब्ध है जैसे-मंचप्रस्तुति, शिक्षण, शास्त्रकार, आलोचक, समीक्षक, ग्रन्थप्रकाशक, पाश्र्वगायन, गीतकार, मंजसज्जा, रूप सज्जा, वस्त्र सज्जा, वाद्य यंत्र निर्माता एवं विक्रेता, आकाशवाणी, दूरदर्शन कलाकार, बैंड, वृन्दगान, आरकेस्टा, ध्वन्याकन तकनीक, संगीत चिकित्सा इत्यादि क्षेत्रों में रोजगार के अवसर प्राप्त हैं।

संगीतकार अपने जीविकोपार्जन हेतु अपनी कला का प्रयोग करता है, तो उसे कला की मान-प्रतिष्ठा को आगे बढ़ाने हेतु कर्तव्यनिष्ठ होना चाहिए। हम कह सकते हैं कि शास्त्रीय संगीत अब किसी भी लिहाज से स्वान्तः सुखाय और मनोंरजन का साधन भर नहीं है, बल्कि रोजगार और कैरियर के लिये खुद में अनन्त सम्भावनायें समेटे स्वयं में मुक्ताकाश बन चुका है, इसकी तरफ युवाओं का बढ़ता हुआ रूझान इस बात को पूरी मजबूती से प्रमाणित करता है कि शास्त्रीय संगीत में उनका भविष्य हर प्रकार से उज्जवल है।

रश्मि उपाध्याय
भातखण्डे संगीत सम-विश्वविद्यालय
1, कैसरबाग, लखनऊ

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