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मैं सर्वविद्या की राजधानी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय हूं

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की कहानी उसी की जुबानी

मैं बलखाती- इठलाती माँ गंगा के कुंतल लहरों से सजी-संवरी बाबा विश्वनाथ की काशी के गोद में सर्व विद्या की राजधानी हूँ। मेरा कुलगीत रचते हुए प्रसिद्ध वैज्ञानिक डा0 शान्तिस्वरूप भटनागर ने क्या खूब कहा है –
“मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी।
यह तीन लोकों से न्यारी काशी। सुज्ञान धर्म और सत्यराशी।
बसी है गंगा के रम्य तट पर, यह सर्वविद्या की राजधानी।
मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी।”

ब्रह्म चेतना की अनुभूति कराती पुरियों में श्रेष्ठ काशी –

मेरे जन्म के पूर्व ही काशी अनादि काल से मोक्ष नगरी के रूप में सुविख्यात रही है। मोक्ष विद्या के बिना सम्भव नहीं, विद्याओं में श्रेष्ठ विद्या ब्रह्म-विद्या ही मोक्षदायिनी है। मोक्ष अर्थात मोह से मुक्ति काशी में आकर ही मिलती है। महादेव के महामंत्र “राम” से निष्पन्न ब्रह्म विद्या आचार्य शंकर का “एको ब्रह्म द्वितीयोनास्ति” अथवा गोस्वामी तुलसीदास का “सियाराम मय सब जग जानी” के रूप में जनमानस को पावन करती ब्रह्म चेतना की अनुभूति कराती पुरियों में श्रेष्ठ काशी मेरी धारिणी है।
इसी काशी में तुलसी के रामचरितमानस में सगुण बह्म साकार हुआ तो वहीं कबीर ने निर्गुण ब्रह्म चेतना का साक्षात्कार किया। मेरी धारिणी काशी ने बुद्ध और आचार्य शंकर को जन- जन में अपनी स्वचेतना का बोध कराया। मेरे अंतस में भी मेरे धारिणी का दर्शन समाया है।

इसलिए मेरा कुलगीत कहता है –

वह मुक्तिपद को दिलाने वाले।
सुधर्म पथ पर चलाने वाले।।
यहीं फले-फूले बुद्ध, शंकर, यह राज-ऋषियों की राजधानी ।
मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी

उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए महामना ने लिखा –

मेरे जन्म के पूर्व ही मेरे जनक ने वैदिक वांड्गमय का अनुशीलन कर राजनीतिक- यौगिक पृष्ठभूमि सन्1904 में ही तैयार कर ली।वैदिक विद्या के निष्णात पंडित अपने समय के विदेहराज, सच्चे अर्थों में राजर्षि काशी के राजा प्रभु नारायण सिंह तथा मेरे जनक महामना मदन मोहन मालवीय ने मिलकर 1905 में शैक्षिक जगत में प्रथम पाठ्यक्रम को तैयार किया। प्रथम पाठ्यक्रम को प्रकाशित करते हुए, मेरे स्थापना के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए महामना ने लिखा कि -व्यक्ति और समाज की उन्नति के लिए बौद्धिक विकास से भी अधिक महत्वपूर्ण है चारित्रिक विकास।

सुयोग्य सच्चरित्र नागरिकों की पौधशाला होगा विवि –

मात्र औद्योगिक प्रगति से ही कोई देश खुशहाल, समृद्ध और गौरवशाली राष्ट्र नहीं बन जाता। अतः युवाओं का चरित्र निर्माण करना प्रस्तावित विश्वविद्यालय का एक प्रमुख लक्ष्य होगा। उच्च शिक्षा द्वारा यहां केवल अभियंता, चिकित्सक, विधि-वेत्ता, वैज्ञानिक, शास्त्रज्ञ विद्वान ही नहीं तैयार किये जायेंगे, वरन् ऐसे व्यक्तियों का निर्माण किया जायेगा जिनका चरित्र उज्जवल, जो कर्तव्य परायण और मूल्यनिष्ठ हों। यह विश्वविद्यालय केवल अर्जित ज्ञान के स्तर को प्रमाणित कर डिग्रियां देने वाली संस्था न होकर सुयोग्य सच्चरित्र नागरिकों की पौधशाला होगा।”

मेरे प्रथम पाठ्यक्रम में भी भारतीय दर्शन की छिपी उद्घोषणा को मेरे कुलगीत ने स्पष्ट कर दिया –

यहाँ की है यह पवित्र शिक्षा ।
कि सत्य पहले फिर आत्म-रक्षा ।।
बिके हरिश्चन्द्र थे यहीं पर, यह सत्यशिक्षा की राजधानी ।
मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी ।।

अभिभूत हर-हर महादेव के गुंजार में खो गया –

पाठ्यक्रम बन जाने के बाद मेरे स्वरूप के विस्तार के लिए मेरे जनक ने एक सुगढ़ शिल्पी की भाँति तीर्थ-राज प्रयाग में सन् 1906 में कुम्भ के महापर्व पर अपनी संकल्पना राष्ट्र के आस्थावान ब्रह्म चेतना से भावित जनमानस के समक्ष रखा, मुझे सुखद आश्चर्य के साथ गर्व की अनुभूति तब हुई जब मेरे विस्तार के लिए एक वय में ही नहीं अपितु ज्ञान में भी वृद्ध माता जी ने अपनी पोटली से एक नया पैसा दान स्वरूप मेरे जन्म दाता पं.मालवीय जी को समर्पित किया। मैं अभिभूत हर-हर महादेव के गुंजार में खो गया। मेरा मन वृद्ध माई के स्नेह -दुलार से हिलोरें मारने लगा,मैं मगन त्रिवेणी के पावन संगम के कलकल निनाद में ब्रह्म नाद से पूरित अपना नाद मिला बैठा।
“वह वेद ईश्वर की सत्यवाणी ।
बनें जिन्हें पढ़ के ब्रह्मज्ञानी।।”

यहां पढ़ें – “विश्व भारती की कहानी उसी की जुबानी “

विद्या की त्रिवेणी बीएचयू सोसाइटी 15 दिसम्बर 1911ई. को स्थापित हुई –

इधर मुझे आत्ममुग्धता में छोड़ महामना मेरे विस्तार के लिए दानराशि संग्रहित करने में लग गये। महामना ने वैदिक विज्ञान की पण्डिता डॉ. ऐनी बेसेन्ट एवं दरभंगा के राजा महाराजा रामेश्वर सिंह को अपनी वाक्पटुता से अपनी योजना में सहयोग करने लिए मना लिया। अपने समय के तीनों महान व्यक्तित्व के मिलने से विद्या की त्रिवेणी बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी सोसाइटी 15 दिसम्बर 1911ई. को स्थापित हुई, जिसके अध्यक्ष महाराज दरभंगा रामेश्वर सिंह, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के प्रमुख बैरिस्टर सुन्दरलाल सचिव, महाराज प्रभुनारायण सिंह, डॉ. ऐनी बेसेंट के साथ ही मेरे जन्मदाता महामना पण्डित मदनमोहन मालवीय स्वयं सम्मानित सदस्य के रूप सम्मिलित हुए।मैं बाल सुलभ किलकारी भरते हुए अपने विधिक मान्यता के लिए आतुर हो उठा।

मुझे विधिक मान्यता मिल गई –

महामना मालवीय ने पिता धर्म निभाते हुए मेरे विधिक मान्यता के लिए सन् 1915 ई. में तत्कालीन शिक्षामंत्री सर हारकोर्ट बटलर से आग्रह किया। महामना के आग्रह को स्वीकार करते हुए शिक्षामंत्री सर हारकोर्ट बटलर ने केंद्रीय विधानसभा से हिंदू यूनिवर्सिटी एक्ट को गवर्नर जनरल लार्ड हार्डिंज की स्वीकृति से पारित कराया। एक्ट पारित होते ही मुझे विधिक मान्यता मिल गई।

माँ सरस्वती के जन्म दिवस पर समारोह निश्चित किया –

विधिक मान्यता मिलते ही मेरे शिल्पी ने विधिवत शिलान्यास के लिए काशी के महाराज प्रभुनारायण सिंह से दान स्वरूप प्राप्त भूमि पर वाग्देवी माँ सरस्वती के जन्म दिवस पर समारोह निश्चित किया। माँ गंगा के पावन तट के पश्चिम, रामनगर के समानान्तर पवित्र भूमि पर मेरी आधार शिला काशी हिंदू विश्वविद्यालय नाम से रखने का निश्चय हुआ। मैं अपने भाग्य पर इतराता हुआ, अपने कुलगीत को गुनगुनाने लगा-
सुरम्य धाराएँ वरूणा अस्सी।
नहाये जिनमें कबीर तुलसी।
भला हो कविता का क्यों न आकर, यह वाग्विद्या की राजधानी।
मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी।

बीएचयू के रूप मे नव्यता प्राप्त हुई –

इस प्रकार 14 जनवरी 1916 ई. (वसंतपंचमी) के दिन मुझे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के रूप मे नव्यता प्राप्त हुई । मेरे जन्म दाता की संकल्पना साकार हो उठी। जिसे मेरे कुलगीत ने अपने हृदय में स्थान दिया –
यह मालवीय जी की देशभक्ति।
यह उनका साहस यह उनकी शक्ति।
प्रगट हुई है नवीन होकर, यह कर्मवीरों की राजधानी।
मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी।

मेरा विकास भारत के गौरवमयी इतिहास पर आधारित है –

मेरे शिल्पी महामना ने मुझे भारत की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में सजाया संवारा है। मेरा विकास भारत के गौरवमयी इतिहास पर आधारित है, शायद इसीलिए मेरे कुलगीत में मेरा स्वरूप मुखरित हो उठा –
नये नहीं हैं ये ईंट पत्थर।
है विश्वकर्मा का कार्य सुन्दर।
रचे हैं विद्या के भव्य मन्दिर, यह सर्वसृष्टि की राजधानी।
मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी।

मैं नित नये-नये आयाम तय करता हुआ बढ़ता रहा –

मेरे शिलान्यास समारोह मे गांधी जी ने गण्यमान्य लोगों के समक्ष अपना ऐतिहासिक भाषण दिया, जिसने स्वतंत्र भारत का पथ प्रशस्त किया। 1अक्टूबर सन् 1917 ई . से सेंट्रल हिन्दू कालेज के प्रांगण में मैं नित नये नये आयाम तय करता हुआ बढ़ता रहा। मैं कब युवा हो गया यह बात तब पता चली जब 13 दिसम्बर सन् 1921 में मुझे विश्वविद्यालय के रूप में नये भवन में सुसज्जित किया गया। प्रिंस ऑव वेल्स ने मेरे मन को छूकर यह सिद्ध कर दिया कि विद्या सबकी है।

मेरा विस्तार मेरे कुलगीत में ध्वनित होता है-

विविध कला अर्थशास्त्र गायन।
गणित खनिज औषधि रसायन।
प्रतीचि-प्राची का मेल सुन्दर, यह विश्वविद्या की राजधानी।
मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी।

जनक के दर्शन को गति देने का कार्य यथार्थ रूप में माननीय प्रधानमंत्री जी कर रहे –

अनेक उतार चढ़ाव का साक्षी मैं सौ साल पूरे कर अबाध गति से बढ़ रहा हूँ। मेरे जनक के दर्शन को गति देने का कार्य यथार्थ रूप में माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी कर रहे हैं। जैसा कि मेरे शिल्पी महामना मालवीय के विचारों में परिलक्षित होता है -“भारत केवल हिन्दुओं का देश नहीं है बल्कि यह मुस्लिम, इसाई और पारसियों का भी देश है। देश तभी विकास और शक्ति प्राप्त कर सकता है जब विभिन्न समुदाय के लोग परस्पर प्रेम और भाई चारे के साथ जीवन व्यतीत करेंगे। यह मेरी इच्छा और प्रार्थना है कि प्रकाश और जीवन का यह केन्द्र जो अस्तित्व में आ रहा है वह एसे छात्र प्रदान करेगा जो अपने बौद्धिक रूप से संसार के दूसरे श्रेष्ठ छात्रों के बराबर होंगे, बल्कि एक श्रेष्ठ जीवन व्यतीत करेंगे, अपने देश से प्यार करेंगे और परम पिता के प्रति इमानदार रहेंगे।”

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