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गांव से निकले रेसलर बजरंग पूनिया ने भारत को दिलाया कांस्य, टोक्यो ओलिंपिक में दिखा दिया अपना दम

बजरंग पूनिया एकमात्र ऐसे भारतीय रेसलर हैं जिन्होंने वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप में तीन मेडल जीते हैं। 2018 में उन्होंने सिल्वर मेडल जबकि 2013 और 2019 में उन्होंने ब्रॉज मेडल जीते थे। अब उन्होंने ओलिंपिक में भी अपना झंडा बुलंद किया और ब्रॉन्ज मेडल जीत लिया।

टोक्यो। भारतीय रेसलर बजरंग पूनिया ने टोक्यो ओलंपिक्स में भारत को कांस्य पदक दिलाया है। बजरंग पूनिया किसी पहचान को मोहताज नहीं हैं। अपनी दांव-पेंच का जलवा दिखाकर उन्होंने रेसलिंग की दुनिया में भारत का सिर गर्व से ऊंचा करवाया है तो वहीं एक से बढ़कर एक उपलब्धि अपने नाम की है। बजरंग को उनकी कामयाबियों के लिए अर्जुन अवॉर्ड, पद्मश्री अवॉर्ड और राजीव गांधी खेलरत्न पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। हरियाणा के झज्जर जिले के खुदान गांव से ताल्लुक रखने वाले बजरंग पूनिया का जन्म 26 फरवरी 1994 को हुआ था। वो भारत का प्रतिनिधित्व 65 किलोग्राम भारवर्ग में करते हैं और फ्रीस्टाइल रेसलर हैं। बजरंग ने टोक्यो ओलिंपिग 2020 में देश का गौरव बढ़ाते हुए मेन्स फ्रीस्टाइल 65 किलो कैटेगरी में ब्रॉन्ज मेडल जीता।

बजरंग पूनिया की उपलब्धियां

टोक्यो ओलिंपिक में मेडल जीतने से पहले बजरंग पूनिया एकमात्र  ऐसे भारतीय रेसलर हैं जिन्होंने वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप में तीन मेडल जीते हैं। 2018 में उन्होंने सिल्वर मेडल जबकि, 2013 और 2019 में उन्होंने ब्रॉज मेडल जीते थे। इसके अलावा बजरंग पूनिया ने एशियन गेम्स में अब तक दो मेडल जीते हैं। 2018 में उन्होंने गोल्ड मेडल जबकि 2014 में सिल्वर मेडल अपने नाम किया था। इसके अलावा कॉमनवेल्थ गेम्स में उन्होंने 2018 में गोल्ड मेडल जबकि 2014 में सिल्वर मेडल जीता था। वो एशियन चैंपियनशिप में 7 मेडल जीत चुके हैं जिसमें 2017, 2019 में गोल्ड मेडल, 2021, 2020, 2014 में सिल्वर मेडल और 2013 और 2018 में ब्रॉन्ज मेडल शामिल है। इसके अलावा कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप में उन्होंने साल 2016 और 2017 में गोल्ड मेडल जीते थे और अब पुनिया ने टोक्यो ओलंपिक्स में भी भारत को कांस्य पदक दिलाया है।

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गरीबी में बीता बजरंग का बचपन

बजरंग पूनिया ने सात साल की उम्र में रेसलिंग शुरू कर दी थी और उनके पिता ने उन्हें इस खेल में आगे बढ़ने के लिए हमेशा प्रोत्साहित किया। बजरंग की पालन-पोषण उनके गांव में ही हुआ और उनके पिता के पास उन्हें पारंपरिक खेल में आगे बढ़ाने के लिए पैसे नहीं थे। इसकी वजह से ही उन्होंने कबड्डी और रेसलिंग जैसे मुफ्त खेलों में भाग लिया। बजरंग के पिता भी पहलवान थे और उन्होंने अपने बेटे को एक स्थानीय कुश्ती स्कूल में डाल दिया। भारत में कोई कॉमिक बुक या सुपर हीरो नहीं था इस वजह से बजरंग ने भारतीय रेसलर को ही अपना आइडियल माना। बजरंग ने कुश्ती के अभ्यास के लिए स्कूल बंक करना शुरू कर दिया और इसके बाद उनका परिवार सोनीपत चला गया ताकि वह भारतीय खेल प्राधिकरण के एक क्षेत्रीय केंद्र में ट्रेनिंग ले सकें। इसके बाद बजरंग ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपनी मेहनत के दम पर वो भारत के बेहद सफल रेसलर हैं।

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