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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विशेष लेखचित्र : योगी के घर जन्मे योगेश्वर श्रीकृष्ण

चारों तरफ घटा- टोप अंधेरी रात है ,उधर कारागार में देवकी प्रसव की पीड़ा से अत्यंत व्याकुल हैं। वसुदेव; देवकी को ढांढस बंधा रहे हैं। वसुदेव की बात को सुन देवकी जोर-जोर से रूदन करने लगती हैं, वसुदेव से लिपटकर रोते हुए कहती हैं प्रिय क्या इस बार भी मेरे हृदय का टुकड़ा उस काल के क्रूर हाथों से नहीं बचेगा? अपने असहाय जीवन और दुर्भाग्य को सोच देवकी के सजल आंखों से अश्रुधारा बहने लगती है। धैर्य और संयम की प्रतिमूर्ति वसुदेव जो अपने जीवन संगीनि को अगाध प्रेम करते हैं, विचलित हो उठते हैं । वह अपने वेदना को धैर्य की चादर में छिपाते हुए एक दार्शनिक की भांति कहते हैं कि जैसे माया के आच्छादन को काट ब्रह्म प्रकट होता है, ठीक उसी तरह तेरे गर्भ से मायापति प्रकट होंगे, यह अंधेरी रात ही अब हमारे जीवन की उजाली रात बनेगी, जगत का पालनहार आज तुम्हारे गर्भ से अवतार लेगा, संसार की नकारात्मकता का विनाश करेगा, सकारात्मक परंपराओं की पुनर्स्थापना करेगा, ऐसा मेरा लाडला आने वाला है। आत्मविश्वास से परिपूर्ण वसुदेव की प्रेमपूर्ण बातों को सुन देवकी के मन में उत्साह का संचार होता है, वह अपनी पीड़ा को भूल उस परम ब्रह्म चेतन का ध्यान करती है।

रह -रहकर उसकी प्रसव पीड़ा उठती है, वसुदेव उसे साहस देते हैं, आखिरकार देवकी के गर्भ से स्वर्णमय आभा से युक्त माया के तिमिर बंध को काट आनादि ब्रह्म इस भूतल पर प्रकट हो ही जाता है। देवकी एक योगिनी की भांति अपने अंतस के प्रकाश को समेट लेना चाहती है, वह अपने शिशु को अंक में भर हृदय से लगा लेती है, वह भावविभोर हो अपने लाल को चूमने लगती है, प्रसव की वेदना स्वतः ही दूर हो जाती है, वेदना का स्थान अब आनंद ने लिया है, सच ही किसी ने कहा वेदना के गर्भ से आनंद का जन्म होता है, महाकवि जयशंकर प्रसाद ने भी लिखा है-“दुःख की पिछली रजनी बीच विकसता सुख का नवल प्रभात”।

देवकी के आनंद का अनुभव कर वसुदेव की आंखों से भी आनंद के आंसू बहने लगते हैं। वसुदेव आनंद निमग्न होते हुए भी अपने कर्त्तव्य बोध के प्रति सजग हैं, उन्हें देवताओं और ऋषियों की वाणी सद्यःप्रसूत की भांति याद हो जाती है। वह अपने मन में विचार करते हैं कि कैसे इस बालक को कंस के क्रूर हाथों से बचायें, कौन-सा उपाय करें कि इसकी रक्षा हो जाये, तभी मायाधीश; वसुदेव को अपने सत्य स्वरूप का दर्शन कराते हैं।

मायापति के चतुर्भुज स्वरूप का दर्शन देवकी- वसुदेव के साथ महाराज उग्रसेन भी करते हैं, सत्य स्वरूप का दुर्लभ दर्शन योगियों को ही प्राप्त है, तो क्या वसुदेव-देवकी और उग्रसेन को बिना योग साधना के यह दुर्लभ दर्शन प्राप्त हो गया शायद नहीं, इन सभी ने अखण्ड योग साधन की है।

योग की सम्पत्ति को धारण करते हुए भी वसुदेव-देवकी और उग्रसेन तीनों ही ब्रह्म का साक्षात्कार करने के लिए अनेक शारीरिक और मानसिक कष्ट को सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं।

योगविद उग्रसेन को ज्ञात है कि नकारात्मक शक्तियों से परिपूर्ण कंस के अत्याचार का शमन करने के लिए योगेश्वर का प्राकट्य एक योगिनी के गर्भ में एक योगी के बीज बिन्दु की स्थापना से ही संभव है, इसीलिए वह अपनी योगिनी पुत्री देवकी का विवाह योगी वसुदेव से सम्पन्न कराते हैं।

कंस जो स्वयं अपनी भगिनी योगिनी देवकी को बहुत प्रेम करता है परन्तु जब उसे देवकी को विदा करते समय ज्ञात होता है कि देवकी का पुत्र ही उसका विनाशक होगा तो वह भयभीत हो जाता है। कंस अपने भय को छिपाने के लिए दंभपूर्ण प्रलाप करते हुए कहता है कि तीन लोक में कौन ऐसा है जो मुझे मार सके। कंस भयभीत हो भय को भय से ही छिपाना चाहता है, भय के माया का सृजन करता है और वह कर ही क्या सकता है?

नकारात्मक शक्तियां भय को छिपाने के लिए भय का ही आश्रय जो लेती हैं, नकारात्मक प्रकृति के वशीभूत अपने झूठे दंभ को पोषित करने के लिए भय का प्रपंच उसे सुगम लगता है। वह देवकी को मारने के लिए प्रयास करता है परन्तु वाकविद्या में निपुण मंत्रियों के बात मान देवकी-वसुदेव को कारागार में डाल देता है। महाराज उग्रसेन जो योग विद्या में निपुण हैं, वह वसुदेव-देवकी को नियति का ज्ञान देते हैं। आज उसी नियति के फलस्वरूप भाद्रपद मास (भादों मास) की अष्टमी तिथि को घनघोर काली रात में योगेश्वर का दुर्लभ दर्शन प्राप्त कर वसुदेव-देवकी और उग्रसेन योगस्थ हो जाते हैं, लौकिक दृष्टि से वेसुध हो जाते हैं, तभी आकाशवाणी से वह सचेत हो अपने शिशु की रक्षा के लिए उद्यम करने के लिए तत्पर होते हैं। योगेश्वर की लीला से उनकी जंजीरें और जेल के द्वार खुल जाते हैं।

जेल के प्रहरी मोह निशा के प्रभाव से निद्रित हो जाते हैं। वसुदेव सहजता से अपने लाल को उठाकर चलने के लिए ज्यों ही उद्यत होते हैं,देवकी असहज हो उठती हैं,हों भी क्यों न माँ जो ठहरी, वह अपने लाल को अपने से दूर नहीं करना चाहती हैं, पर वसुदेव उन्हें ढाढस देते हैं कि वह अपने लाल को अपने मित्र परमयोगी गोपराज नन्द के यहां ले जायेंगे। वसुदेव अपने लाल को सूप में रख आगे बढ़ते हैं, मूसलाधार वर्षा हो रही है, बीच – बीच में विद्युत ध्वनि से वातावरण विक्षुब्ध हो उठता है। आपदाओं से बिना भयभीत हुए वसुदेव अपने कर्त्तव्य पथ पर अग्रसर हैं, यही तो एक योगी की पहचान है, जो बाधाओं से बिना विचलित हुए कर्त्तव्य का सम्पादन करता है।

यमुना का जलस्तर बढ़ा हुआ है, नन्द के घर यमुना के प्रवाह से होकर ही जाना होगा, नौका भी नहीं है। वसुदेव अपने धुन में सजगता से यमुना के जल में प्रवेश करते हैं,पर यह क्या यमुना अपने आराध्य के चरणों को पखारने के लिए मचल हो उठती हैं। ज्यों- ज्यों यमुना वेगवती हो ऊपर की तरफ हिलोरें लेती हैं, त्यों-त्यों वसुदेव अपने लाल को बचाने के लिए ऊपर उठाते हैं। वसुदेव के कंठ तक यमुना के जल प्रवाह को देख लीलाधर मुस्कराते हुए अपने चरणों को लटका देते हैं, श्री चरणों को पखारने के लिए यमुना जोर से हिलोर लेकर दोनों चरण धुल अपने चिर आभिलाष को पूर्ण कर आह्लादित हो उठती हैं। श्री चरणों का स्पर्श कर यमुना वसुदेव को सुगम मार्ग प्रशस्त कर देती हैं।

यमुना पार कर वसुदेव नन्द के घर आतें हैं और नन्द से सब वृतांत कहते हैं। नन्द अपनी नवजात पुत्री जो वस्तुतः योगमाया हैं, को देकर आश्वस्त करते हैं कि आपका लाल मेरा लाल है। वसुदेव भावविभोर हो जाते हैं, लेकिन तत्क्षण ही वह दुखी होकर कहते हैं कि क्रूर कंस आपकी पुत्री को मार डालेगा, नहीं मैं अपने स्वार्थ के लिए ऐसा अधम कृत्य नहीं कर सकता, वह अपने लाल को वापस ले जाने को उद्यत होतें है। गोपराज नन्द वसुदेव को समझाते हैं कि कंस पुत्र के स्थान पर पुत्री को देख सम्भवतः अपने निर्णय को बदल दे, तो इस तरह हम दोनों का कल्याण हो सकता है। नन्दराज कहते हैं कि वैसे भी संसार के कल्याण के लिए त्याग तो करना ही पड़ता है। गोपराज के समझाने पर वसुदेव योगमाया को लेकर वापस कारागार में आ जाते हैं और देवकी को गोद में देकर उसकी कुशलता की कामना करते हुए परमब्रह्म का ध्यान करते हैं।

योगमाया के प्रभाव से कारागार में सबकुछ यथावत हो जाता है। प्रहरी शिशुकन्या के रूदन से जाग जाते हैं, संदेश वाहक कंस को सूचित करते हैं कि देवकी के गर्भ से कन्या ने जन्म लिया है, कंस कन्या के जन्म की बात सुन अट्टहास करता है। वह कहता व्यर्थ ही मुझे अपनी बहन को कष्ट देना पड़ा लेकिन तत्क्षण वह शंकित हो विचार करता है, कहीं यह देवों की कोई चाल तो नहीं। कंस नकारात्मक प्रकृति के वशीभूत हो कन्या को मारने का निर्णय करता है और वह देवकी के पास पहुंच कन्या को बलात छीन कर वध करने के लिए ज्यों ही प्रयत्न करता है, त्यों ही कन्या कंस के हाथ से छूटकर आकाश में जा गर्जना करती हुई कहती है कि कंस तेरा विनाशक जन्म ले चुका है, तूने नारियों, ॠषियों, बालकों पर अत्याचार तो किया ही अब तूने एक कन्या पर भी अत्याचार करने का प्रयास किया है।

रे कंस तेरा विनाश अवश्यसम्भावी है, इतना सुनते ही कंस तेज हीन हो जाता है। कंस भय से कांपते अपने अनुचरों को दंभपूर्ण आदेश ददेता है कि सभी नवजात शिशुओं का वध कर दो ,उसके आदेश से राज्य के बालकों पर बहुत अत्याचार हुआ, राज्य भर के अनेक बालक अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए। उधर गोपराज नन्द के संरक्षण में वासुदेव नन्द लाल, यशोदानन्दन कृष्ण के नाम विख्यात होने लगे। बाल लीला और योगबल से पूतना, काकासुर तथा अनेक राक्षसों का वध करते हैं। कृष्ण गौचारण के समय पर्यावरण के प्रति सजगता प्रकट करने हेतु, एक तरफ इन्द्र का मान मर्दन कर गोवर्धन पूजा की नवीन परम्परा स्थापित करते हैं, तो वहीं यमुना के जल शोधन के लिए कालिया नाग के मान मर्दन का दृष्टांत भी प्रस्तुत किया है।

कृष्ण आगे चलकर मल्लयुद्ध में कंस को पराजित करने के साथ ही उसका वध कर महाराज उग्रसेन को पुनः पदस्थापित करते हैं। कृष्ण ने न केवल अपने माता-पिता को कंस के अत्याचार से मुक्त किया अपितु राज्य के सभी नागरिकों को अभयदान दिया। कृष्ण ने अपने व्यक्तित्व से महाभारत के समय श्रीमद्भागवदगीता का प्रतिपादन कर इस वसुधा को अद्वितीय योगविद्या से उपकृत किया, अधर्म का नाश कर धर्म की स्थापना की। धर्म के सम्पादन के लिए उन्होंने अपने पराये का भेद दूर कर निष्पक्ष न्याय व्यवस्था, शासन व्यवस्था की पुनर्स्थापना की। शायद इसीलिए कृष्ण को योगेश्वर कहा जाता है।

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