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ओलंपिक में भारत का भाला, महाराणा प्रताप ही नहीं धर्मराज युधिष्ठिर भी थे भाला के अद्वितीय योद्धा

द्वंद्व कहां तक पाला जाए, तू भी है राणा का वंशज फेंक जहां तक भाला जाए

भाला से भारत का भाल एकबार पुनः चमक उठा, उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए नीरज चोपड़ा,सुमित अंतिल ने स्वर्ण पदक तथा देवेन्द्र झाझरिया ने रजत पदक,सुंदर सिंह ने कांस्य पदक प्राप्त करते हुए भाला संचालन की गौरवशाली परम्परा की याद ताजा कर दी।प्राचीनकाल में धर्मराज युधिष्ठिर तो वहीं मध्य युगीन भारतीय गौरव की पहचान राणा के भाला की याद प्रत्येक भारतीय को अतीत में झांकने का अवसर दे रही है। मध्ययुग में राणा और भाला न केवल मेवाण अपितु भारत की गौरवशाली सांस्कृतिक परम्परा के संरक्षक एवं संवाहक थे। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के वंशज राणा प्रताप अपने नाम के समान ही प्रतापी भी थे।

राणा अनेक कलाओं में प्रवीण थे ,वे जनमानस के प्राण थे। चारों तरफ भारतीय संस्कृति पर प्रहार हो रहा था, भारतीय रणबांकुरे नेतृत्व के अभाव में अपनी अस्मिता की रक्षा करने में अपने -आपको अक्षम पा रहे थे। ऐसे समय भारतीय क्षितिज पर मेवाण के भूमि से अरावली की पहाड़ियों की दीर्घ श्रृंखलाओं के बीच सूर्य वंश का सूर्य राणा प्रताप आशा की किरणें विखेरता हुआ दिखाई पड़ता है।

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हाँ तो बात चल रही थी राणा और भाला की,राणा को अनेक युद्ध कला आती थी पर भाला संचालन और फेंकने में उन्हें अद्वितीय निपुणता प्राप्त थी। राणा और भाला देख बड़े से बड़े शत्रु तेजहीन हो जाते थे। राणा अपने भाला से अगाध प्रेम करते थे ,करे भी क्यों न, प्रेम से ही शक्ति प्राप्त होती है। जब कोई योद्धा अपने अस्त्र-शस्त्र से, शास्त्रज्ञ अपने शास्त्र से, कलाकार अपने कला से प्रेम करता है तो वे अस्त्र-शस्त्र, शास्त्र, और कला अपने धारण करने वाले से भी प्रेम करने लगते हैं, वह उसकी शक्ति बन जाते हैं, वे एक दूसरे से अभिन्न हो एक- दूसरे के पूरक बन जाते हैं, शायद इसीलिए लिए प्राचीन भारतीय मनीषियों ने शस्त्र, शास्त्र, कलाकृतियों की पूजा का विधान रखा, जो आज भी परम्परागत रूप से स्वीकार है।

राणा अपने भाला का प्रयोग धर्म की रक्षा के लिए ही करते थे, उनका धर्म लोक कल्याण से प्रेरित था। शायद उन्होंने यह शिक्षा धर्मराज युधिष्ठिर को आदर्शमान कर ली हो क्योंकि युधिष्ठिर भी भाला युद्ध कला में अपने समय के अद्वितीय योद्धा थे और धर्म रक्षा के लिए तत्पर। एक ओर बात जो राणा प्रताप और युधिष्ठिर में समान थी, वह थी सम्राज्य विस्तार से विरक्ति, दोनों ही राज्य विजित करने के उपरांत उसी राज्य के सुयोग्य अधिकारी को राज्य की शासन व्यवस्था देने में विश्वास करते थे।

राणा और भाला एक तरह से भारतीय इतिहास में लक्ष्य के प्रति समर्पण और एकाग्रता का भी पर्याय बन गये हैं।

प्राचीन मूर्तिकला के इतिहास के अवलोकन से ज्ञात होता है कि भाला, कुंत के नाम से विख्यात था, जो भारतीय दार्शनिक परम्परा के अनुसार एकाग्रता का प्रतीक है, इसीलिए देव प्रतिमाओं को कुंत से अलंकृत किया जाता रहा।

राणा प्रताप और धर्मराज युधिष्ठिर का लोक कल्याण हेतु संकल्पबद्ध होना और शस्त्र के रूप में भाला का चयन करना मात्र संयोग नहीं अपितु उनकी मूल प्रकृति का द्योतक है।

भारत में भाला शस्त्र पाणिमुक्ता, अर्थात् हाथ से फेंके जानेवाले शस्त्र के अंतर्गत है। पाणिमुक्ता शस्त्रों में भाला (कुंत) का अपना विशेष महत्व है।यह एकाग्रता और मनोशारीरिक शक्ति के विकास में सहायक है। आधुनिक युग में भाला एक खेल प्रतिस्पर्धा का रूप ले चुका है। वैसे तो भाला प्रागैतिहासिक काल से शिकार और आत्म रक्षा का प्रमुख शस्त्र था परन्तु विज्ञान के विकास से भाला जैसे शास्त्रों का स्थान आधुनिक शस्त्रों ने ले लिया। विज्ञान के विकास के साथ ही भाला ने ताल मिला अपने को योद्धाओं तथा जनमानस के स्वास्थ्य के विकास हेतु तैयार कर लिया।

आज के युग में भाला एक खेल का विकसित रूप ले चुका है तभी तो भारत ने ओलंपिक में दो स्वर्ण पदक जीत कर, राणा और भाला का सच्चा उत्तराधिकारी सिद्ध किया है।

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