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कोरोना काल में दिमाग में आई आक्रामकता को नियंत्रित करेगा सूर्य नमस्कार

भारत सरकार के आयुष मंत्रालय की ओर से सूर्य नमस्कार का आयोजन 14 जनवरी को

भारतीय मनीषियों के अन्वेषण की अमूल्य और अद्भुत यौगिक निधि सूर्य नमस्कार का अविष्कार वर्तमान परिवेश में बढ़ रही आक्रामकता की प्रवृत्ति को नियंत्रित करने में अमृत संजीवनी की तरह है। आक्रामकता को नियंत्रित कर उपयोगी बनाने में सूर्य नमस्कार को एक प्रभावी यौगिक युक्ति के रूप में अपनाया जा सकता है।

आक्रामकता एक तरह से मानव की मूल प्रवृत्ति है, परंतु जब यही आक्रामकता किसी अंतः अथवा बाह्य कारण से अत्यधिक हो जाती है, तो वह न केवल समाज के लिए ही अपितु स्वयं के मन और शरीर के लिए घातक हो जाती है। आक्रामकता विभिन्न प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक रुग्णता की वृद्धि करता है जिससे व्यक्तित्व का विखंडन प्रारंभ हो जाता है। व्यक्तित्व के विखंडन के फलस्वरूप सामाजिक स्वास्थ्य को हानि पहुंचती है ।

आक्रामकता को सृजनात्मक शक्ति के रूप में रूपांतरित करने हेतु योग विद्या का आश्रय लिया जा सकता है। योग विद्या हमें चित्त की वृत्तियों को निरुद्ध करने की अद्भुत वैज्ञानिक युक्ति बतलाती है।

योग विद्या के एक विशेष वैज्ञानिक युक्ति सूर्य नमस्कार के द्वारा मनोसंवेग को नियंत्रित कर शारीरिक कार्य क्षमता का विकास करने के साथ ही सृजनात्मक व्यक्तित्व का विकास किया जा सकता है।

प्राचीन काल में आचार्य प्रवर विशेषकर विद्यार्थियों को नित्य उषाकाल के समय सूर्य नमस्कार का ध्यानात्मक अभ्यास कराते थे ,जिसके फलस्वरूप उनकी धारणा शक्ति तीव्र हो जाती थी। धारणा शक्ति के विकास से उनमें प्रबल आत्मविश्वास जागृत होता था। प्रबल आत्मविश्वास के कारण ही उनका व्यक्तित्व बहुत ही परिष्कृत होता था।

शास्त्रों में सूर्य को आत्मा का प्रतिनिधि माना जाता है। जब हम सूर्य नमस्कार करते हैं तो हमारी जैविक घड़ी व्यवस्थित हो जाती है ।

  • उषाकाल में सूर्य नमस्कार के अभ्यास के कारण विद्यार्थियों के शारीरिक उन्नयन के साथ ही मानसिक शक्ति का विकास स्वतः होने लगता है।
  • सूर्य नमस्कार के अभ्यास से मांस पेशियां लचीली एवं सशक्त होती हैं।
  • रक्त संचार व्यवस्थित होता है ।
  • पाचन तंत्र सक्रिय होता है। तंत्रिका तंत्र में आयी हुई रुकावट दूर होती है,इस तरह से शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य की अभिवृद्धि के लिए आवश्यक अंतः स्रावी ग्रंथियां भी सक्रियता से रसों का श्रावण करती है।

सूर्य नमस्कार एड्रिनल ग्रंथि से निकलने वाले रसों को अच्छे रसों में  बदलता है

यहां यह है द्रष्टव्य है कि आक्रामकता अंतः स्रावी ग्रंथियों में प्रमुख एड्रीनलीन ग्रन्थि से स्रावित होने वाले हारमोंस के कारण विध्वंस कारी प्रवृत्ति का सृजन करती है। जब हम सूर्य नमस्कार के द्वारा प्राणशक्ति को नियंत्रण करते हुए ध्यान का भी अभ्यास करते हैं, उस समय एड्रिनल ग्रंथि से निकलने वाले रसों का रूपांतरण अच्छे रसों के रूप में जैसे एंडोर्फिन ,सेरोटेनिन के रूप हो जाता है, फलतः विद्यार्थियों में सृजनात्मक शक्ति का उदय होता है, उनकी कार्यात्मक क्षमता का विकास होता है और वह सच्चे अर्थों में कुशलता की अभिवृद्धि करके “योगःकर्मसु कौशलम्” की अवधारणा को साकार करते हैं।

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सूर्य नमस्कार योग विद्या कि वह अनुपम युक्ति है ,जिसके अंतर्गत हमारे ऋषियों ने वैज्ञानिक दृष्टि के द्वारा आसन, प्राणायाम और ध्यान को एक समन्वितरूप में प्रस्तुत किया है।

सूर्य नमस्कार वस्तुतः ऋषियों द्वारा निर्देशित सूर्य विद्या अथवा सूर्य विज्ञान है। सूर्य विद्या का अभ्यास ऋग्वेद में उषा काल के समय उपयुक्त माना गया है ।

ऋग्वेद के प्रथम मंडल में उल्लेख प्राप्त होता है कि प्रातः काल जब सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती है ,उस काल को उषा काल कहा जाता है ,आगे उल्लेख आता है कि उषा सूर्य की पुत्री है (श्लोक-5, प्रथमं मंडलम् ऋग्वेद- भाष्य, पृष्ठ 134 )।ऋग्वेद मैं आगे उल्लेख आता है कि “भास्वती नेत्री सूनृतानां दिवः स्तवे दुहिता गोतमेभिः।प्रजावतो नृवतो अश्वबुध्यानुषो गोअग्राँ उप मासि वाजान् ।

“अर्थात जैसे सब गुणों से युक्त सुलक्षणी कन्या से पिता, माता सुखी होते हैं, वैसे ही प्रातः काल की वेला के गुण अवगुण प्रकाशित करने वाली विद्या से विद्वान लोग सुखी होते हैं। अगले श्लोक में कहा गया है कि जो लोग प्रातः काल की वेला के गुण अवगुणों को जताने वाली विद्या से अच्छे-अच्छे यत्न करते हैं वे यह सब वस्तु पाकर सुख से परिपूर्ण होते हैं, दूसरे नहीं ।इस प्रकार उषाकाल में सूर्य के आराधना करने के लिए ऋग्वेद हमें निर्देशित करता है कि यथा- आ जुहोता स्वध्वरं शीरं पावकशोचिषम् आशुं दूतमंजिरं प्रत्नमीड्यं श्रुष्टी देवं सपर्यत।।8।।(तृतीय मण्डलम् ऋग्वेदभाष्यम्, पृष्ठ 318) अर्थात जो बिजली के तुल्य व्यापक स्वयं प्रकाश रूप अविद्यादि दोषों का नाश करने वाला सनातन अनादि काल से प्रशंसा करने योग्य परमात्मा है उसी का नित्य ध्यान करो।

इस प्रकार ऋग्वेद काल से लेकर के आधुनिक काल तक सूर्य नमस्कार के महत्व पर अनेक अनुसंधान हुए हैं। महर्षि पतंजलि ने भी सूर्य पर ध्यान केंद्रित करने की बात कही है – “सूर्य संयमात् भुवनज्ञानम्” अर्थात सूर्य मंडल पर ध्यान केंद्रित करने से या संयम करने से समस्त भुवनों का अर्थात ब्रह्मांड का ज्ञान प्राप्त होता है। योग शास्त्र के अनुसार साधारणा, ध्यान और समाधि के समन्वित अभ्यास को संयम कहा जाता है, वहीं योग-शास्त्र के अनुसार भुवन का अर्थ लोक माना गया है जो सात हैं। यह सभी लोक हमारे शरीर में विद्यमान हैं, जो कि क्रमशः भू,भूवः,स्वः, महः,जनः, तपः और सत्यं लोक के नाम से विख्यात हैं शास्त्रों की मान्यता के अनुसार- “यत् पिंडे तत् ब्रह्मांडे” अर्थात जो कुछ इस शरीर रूपी पिंड में है वही इस ब्रह्मांड में भी है।

भारतीय धर्म शास्त्रों एवं योग ग्रंथों का सम्यक अनुशीलन करने से यह प्राप्त होता है कि इस ब्रह्मांड की केंद्रीय शक्ति सूर्य है ,ठीक उसी तरह शरीर की केंद्रीय शक्ति आत्मा है ,जो सूर्य का ही प्रतिबिंब है। महर्षि पतंजलि ने योग सूत्र में वर्णन किया है कि नाभि मंडल पर ध्यान करने से काया रूपी व्यूह की संरचना का ज्ञान प्राप्त होता है, यथा -“नाभि मंडले काया व्यूह ज्ञानम्”। संभवतः हमारे ऋषियों ने सूर्य विद्या को प्राप्त करने के लिए सात प्रकार के आसनों को 12 स्थितियों में समन्वित करते हुए ,मन को संताप रहित बनाने के लिए मंत्रों के उच्चारण के साथ ही प्राण तत्व पर ध्यान केंद्रित करने की क्रियात्मक पद्धति का अविष्कार किया जो आगे चलकर सूर्य नमस्कार के रूप में प्रसिद्ध हुई। सूर्य नमस्कार में प्रणाम आसन हस्त उत्तानासन पादहस्तासन अश्व संचालनासन पर्वतासन अष्टांगनमन (षष्टान्गासन) आसन एवं भुजंगासन को सम्मिलित किया गया है।अष्टांगनमन आसन और भुजंगासन को छोड़कर शेष पांच आसनों की पुनरावृति करते हुए अर्ध आवृत्ति संपन्न होती है।

सूर्य नमस्कार का प्रारंभ सबसे पहले दक्षिण भाग से मंत्रों के साथ किया जाता है अर्थात संचालन की स्थिति में दाहिना पैर आगे की तरफ रहता है, अर्ध आवृत्ति पूर्ण होने के बाद में पुनः उसी प्रकार वाम भाग से 12 स्थितियों में आसनों के उसी क्रम से मंत्र उच्चारण एवं ध्यान की प्रक्रिया के साथ सूर्य नमस्कार संपन्न किया जाता है। इस प्रकार सूर्य नमस्कार की एक आवृत्ति पूर्ण होती है, जो दिन-रात्रि (24 घंटे) के नियंता द्वादश आदित्य के प्रति द्वादश मंत्रों से साधना का एक विशेष विज्ञान है। सूर्य नमस्कार में 7 आसन 7 भुवनों तथा सात चक्रों को सक्रिय करने का कार्य करते हैं ।

चक्रों की सक्रियता से हमारे शरीर को पांचों तत्व तथा चंद्रमा और सूर्य की ऊर्जा प्राप्त होती है। यहां यह द्रष्टव्य है कि चंद्रमा सूर्य के प्रकाश से ही अपने आभामंडल का निर्माण करता है और वह अपने अंदर निहित शीतलता से सूर्य की किरणों को शीतल कर जगत को प्रदान करता है । शास्त्रों के अनुसार सूर्य आत्मा का कारक है, तो वही चंद्रमा मन का कारक है । इस प्रकार सूर्य नमस्कार के द्वारा मन तथा आत्मा को एक लय में लाकर आक्रामकता को सृजनात्मकता में रूपांतरित किया जा सकता है।

वर्तमान समय में कोरोना वायरस जैसी महामारी के कारण विद्यार्थियों में अवसाद तथा भय की समस्या उत्पन्न हो रही है, जिसके कारण विद्यार्थियों ओ परिवार तथा समाज में सामंजस्य स्थापित करने में समस्या उत्पन्न हो रही है। विद्यार्थियों के अंदर तनाव के कारण आक्रामकता में वृद्धि होने की संभावना है। विद्यार्थियों के आक्रामकता के सुनियोजन को दृष्टिगत रखते हुए, प्रायोगिक धरातल पर क्रियान्वित करने हेतु भारत सरकार ने आजादी के अमृत महोत्सव के उपलक्ष्य में 14 जनवरी मकर संक्रान्ति को सूर्य नमस्कार का भव्य आयोजन किया है।

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