सृजनात्मकता कैसे बढ़ाएं

Author

Global User

निशा मणि पाण्डेय

Date :

कुछ नया सोचो, कुछ अलग सोचो, कुछ हटकर सोचो सफलता आपके कदम चूमेगी। आज हम सफलता के एक आवश्यक पहलू पर परिचर्चा करेंगे । आज हम चर्चा करेंगे कि हम खुद में रचनात्मकता अथवा सृजनात्मकता को कैसे जन्म दें । इस विषय पर विभिन्न विचारकों, वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों के भिन्न -भिन्न मत हैं, जिन्हें जानकर और समझकर आप स्वयं भी एक नतीजे पर पहुँच सकते हैं । यहाँ यह उल्लेख समुचित होगा कि यदि हम दिन -प्रतिदिन अपनी क्षमताओं को निखारना चाहते है तो हमें पहले खुद पर विश्वास रखना आवश्यक होगा क्योंकि हम जो ठान लेते है वो अवश्य होता है; इसके विपरीत यदि हम समझते हैैं –हमसे न हो पाएगा तो हमारी सारी ऊर्जा नकारात्मक दिशा में चली जाती है। यहाँ उन हाथियों के झुण्ड की कहानी सुसंगत होगी जो एक छोटी सी चेन के सहारे बंधे हुए आराम से खड़े थे; हमें उनकी तरह न होकर उस सतत प्रयासशील कछुए के समान होने की आवश्यकता है जो निरंतर लक्ष्य की ओर बढ़ता रहा और खरगोश जैसे तीव्रगामी और चंचल जानवर से अंततः विजय पाई । ये प्रेरणात्मक कहानियां आप सबने शायद सुनी होंगी पर एकबार मैं पुनः चर्चा करूंगी। किन्तु उसके पहले आइये चर्चा करते हैं सृजनात्मकता को अपने जीवन में कैसे उतारें ।

सृजनात्मकता जटिल और विभिन्न स्तरों पर किए जाने वाले अन्वेषणों की प्रक्रिया के साथ-साथ किसी खोज के नतीजे तक पहुँचने का स्रोत है । सृजनात्मक होने के लिए व्यक्ति को ज्ञान पिपासु (विषय विशेष में अधिकाधिक जानकारी प्राप्त रखने की इच्छा रखने वाला) होने के साथ -साथ, रचनात्मक प्रवृत्ति वाला होने की आवश्यकता होती है; इतना ही नहीं यदि आपमें ये दोनों विशेषताएं विद्यमान है किन्तु आप में प्रेरणा का किसी भी प्रकार से अभाव है, आलस्य की छाया है, आज करे सो काल करे वाली प्रवृत्ति है तो केवल वैचारिक सृजनात्मकता आपकी क्षमता को भलीभांति निखारने में प्रभावी नहीं हो पाएगी । बल्कि मुंगेरी लाल के सपनों की कहानी ही बनकर रह जाएगी । इस प्रकार आपके विषय विशेष का गहन ज्ञान, उस ज्ञान के विभिन्न तथ्यों को समझने की क्षमता, रचनात्मकता प्रवृत्ति तथा लगातार कुछ नया करने की अनंत चाह के साथ –साथ आपके सतत प्रयास सृजनात्मकता में मददगार साबित होते हैं ।

किसी भी विषय पर अथाह ज्ञान का भंडार है, कुछ मूलभूत तो कुछ मूल पर आधारित और कुछ मिथक और कपोल कल्पनाएं । प्रायः सृजनात्मक प्रवृत्ति के लोग भिन्न -भिन्न उपायों को अपनाकर खुद को स्थापित करते हैं। इनमें से मुख्यतया कुछ ये उपाय हैं-

1. पूर्व में स्थापित सिद्धांतों को प्रायोगिक स्तर पर अपनाते हुए उसमें कुछ नवीन जोड़ते हुए नए सिद्धांत बनाते हैं या नया व्यवहारिक ज्ञान देतेहैं।

2. पूर्व में स्थापित वैचारिक सिद्धांतों का खंडन करते हुए कुछ नए आयामों को जन्म देते हैं।

3.मूलभूत सिद्धांतों के व्यावहारिक पक्ष को उजागर करते हैं।

4.बिलकुल नए अनूठे प्रयोग कर नवीन अविष्कारों को जन्म देते हैं।

5. अचानक के घटनाक्रम को सुव्यवस्थित करते हुए कुछ बेहतरीन प्रयोग कर देते हैं।

सृजनात्मकता के कई पहलू हैं- एक रचनाकार भी सृजनात्मक होता है जो अपनी बातो को लिपिबद्ध कर गद्य (कहानी, लेख, पत्र इत्यादि) अथवा पद्य (कविता, दोहे, शेरो शायरी इत्यादि) के माध्यम से आम जनमानस तक पहुंचाने में निपुण होता है, ऐसे लोग रचनात्मक सृजनात्मकता के धनी होते हैं । वे अपने मन में उत्पन्न होने वाले विचारों को व्यवस्थित रूप में परिभाषित करते हुए समझाने की कोशिश में सफल होते हैं, इस प्रकार के लोगों में अभिव्यक्ति की अद्भुत क्षमता होती है और ऐसे लोग अपनी बातें बहुत अच्छे से लोगों तक पहुंच पाते हैं । ऐसे लोग प्रायः क्या, कब, कैसे लिखना है  कि जानकारी भी रखते हैं।

अच्छी सृजनात्मकता हेतु व्यक्ति में विश्लेषणात्मक क्षमता भी होनी चाहिए, यह आवश्यक है कि वह अपने गुणों और कमियों का सही विश्लेषण कर सके साथ ही उसके बारे में यह विश्लेषण भी कर पाए कि कमियों को कैसे सुधारा जा सकता है । इस गुण को विकसित करने के लिए हम प्रतिदिन यदि ईमानदारी से स्वयं का आत्म विश्लेषण करें और ध्यानपूर्वक अपनी शक्तियों और कमज़ोरियों को समझने का निरंतर प्रयास करते हुए अपनी शक्तियों को विकसित करने में निरंतर प्रयासरत रहें तो निश्चित ही विश्लेषणात्मक क्षमता में दिनोदिन वृद्धि होगी। व्यक्ति की समझ एवं रचनात्मक क्षमता, विश्लेषण की कला तथा व्यावहारिक योग्यताओं का समन्वय उसे सृजनात्मक बनाने में मददगार साबित होता है ।

यहाँ हाथियों के झुण्ड की चर्चा आवश्यक हो जाती है जो अपने मालिक द्वारा छोटे सी चेन और रस्सी में बंधे होने के बावजूद खुद से किसी प्रकार का प्रयास उस बंधन से बाहर आने का नहीं करते दिखे; यह देख आश्चर्यचकित राहगीर ने हाथियों के उस झुंड के महावत से जानकारी चाही कि आखिर ऐसी क्या बात है कि इतने बलशाली हाथी इस छोटी चेन और कील के सहारे बंधे पड़े हैं, कभी स्वयं को छुड़ाने का प्रयास नहीं करते? इस पर झुंड के मालिक ने बताया कि चूंकि बचपन से उन्हें इसी छोटी चेन में बांधकर रखा गया और तब उनके लिए यह बंधन तोड़ना कठिन था और अब उनकी आदत में शामिल है और वो नहीं जानते कि उनकी ताकत इस चेन से स्वयं को मुक्त करने हेतु पर्याप्त है इसलिए वो इस छोटी चेन से भी बंधे रहते हैं। इस कहानी के माध्यम से हमें सीख मिलती है कि हमें हर समय अपने विवेक का इस्तेमाल करते रहना चाहिए, प्रायः बंधनों की आदत हमारे स्वयं की शक्ति का अंदाजा करवाने में गलत साबित होती है ।

नित नया करने हेतु हमें अपनी समझ को दिन प्रतिदिन बेहतर बनाने की प्रयास में लगाना आवश्यक है, और यदि हम ऐसा करते हैं तो कैसी भी कठिन परिस्थिति हो उबरने में आसानी होती है । हमारे निरंतर और अनथक प्रयास किसी भी ऊंचाई पर पहुंचने में पूर्णतः सहायक होते हैं । कछुवा भी खरगोश से दौड़ जीत सकता है । निरंतरता, उत्साह, वस्तुस्थिति की समझ, परिस्थितियों का मूल्यांकन कर समुचित सकारात्मक व्यवहार इत्यादि न केवल आपको दिनोंदिन बेहतर करते हैं बल्कि हमारी सृजनात्मक, रचनात्मक क्षमता में भी भरपूर योगदान करते हैं।

लेखिका, वृद्धावस्था मानसिक स्वास्थ्य विभाग, किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय उ0प्र0, लखनऊ में सह आचार्य (नॉन मेडिकल रिसर्च) के पद पर कार्यरत हैं.