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मध्य प्रदेश में सड़क पर पढ़ाई: 12 वर्षों से रोड पर क्लास, स्कूल भवन के लिए फंड मिला पर जमीन नहीं

Satna News: सतना जिले के इटमा गांव का प्राथमिक विद्यालय पिछले 12 साल से भवन के अभाव में सड़क किनारे चल रहा है। प्राइमरी स्कूल के बच्चे धूल-मिट्टी और बारिश-धूप के बीच खुले में पढ़ने को मजबूर हैं। भवन निर्माण के लिए 10 लाख रुपये स्वीकृत हुए, लेकिन जमीन न मिलने से काम अधर में है।

सतना: एक ओर सरकार ‘स्कूल चलें हम’ और ‘सब पढ़ें, सब बढ़ें’ जैसे अभियानों पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। वहीं, दूसरी ओर सतना जिले के इटमा गांव की तस्वीरें शिक्षा व्यवस्था के दावों की पोल खोल रही हैं। नागौद विकासखंड के इस गांव में पिछले 12 वर्षों से प्राथमिक विद्यालय एक भवन के लिए तरस रहा है। यहां मासूम बच्चे सड़क किनारे धूल-मिट्टी के बीच बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं। इससे उनकी शिक्षा और सुरक्षा दोनों दांव पर लगी है।

यह शर्मनाक स्थिति जिले के शिवराजपुर संकुल केंद्र के अंतर्गत आने वाले शासकीय प्राथमिक विद्यालय, इटमा की है। इस स्कूल में वर्तमान में 19 छात्र-छात्राएं नामांकित हैं। लेकिन पढ़ने के लिए उनके सिर पर पक्की छत नहीं है। बारिश में पढ़ाई ठप हो जाती है। वहीं, गर्मी में बच्चे सड़क किनारे किसी पेड़ की छांव तलाशते हैं।

ग्रामीण की मदद के बाद भी समस्या

गांव के ही एक दरियादिल निवासी दरबारी लाल लोधी ने बिना कोई किराया लिए विद्यालय संचालन के लिए अपना घर दे रखा है। लेकिन जगह की कमी के कारण बच्चों को अक्सर बाहर सड़क पर ही बैठना पड़ता है।

पैसा आया पर जमीन नहीं मिल रही

ग्रामीणों के लंबे संघर्ष के बाद पिछले वित्तीय वर्ष में स्कूल भवन के निर्माण के लिए करीब 10 लाख रुपये की राशि स्वीकृत की गई थी। पैसा खाते में आ गया, लेकिन विडंबना देखिए कि अब भवन बनाने के लिए सरकारी जमीन ही नहीं मिल रही है। जमीन के अभाव में स्वीकृत राशि जस की तस पड़ी है और निर्माण कार्य शुरू नहीं हो पा रहा है।

अधर में लटका है निर्माण

ग्रामीणों का आरोप है कि वे कई बार इस समस्या को लेकर शिक्षा विभाग और प्रशासन के अधिकारियों से गुहार लगा चुके हैं। लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही है। इस संबंध में बीआरसी कुलदीप मौर्य का बयान सामने आया। उन्होंने बताया कि स्कूल के प्रभारी को भवन निर्माण के लिए जमीन तलाशने की जिम्मेदारी दी गई है। इस बाबत पत्र भी जारी किया गया है।

भले ही आरोपों पर सफाई दी जा रही हो। लेकिन विभागीय खानापूर्ति के बीच मासूम बच्चों का भविष्य अधर में लटका है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि प्रशासन जल्द ही इस गंभीर समस्या का संज्ञान लेकर जमीन उपलब्ध कराएगा, ताकि इन बच्चों को भी एक सुरक्षित और स्वच्छ माहौल में पढ़ने का अधिकार मिल सके।

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