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टीचर्स को 1 साल तक पेड लीव, लाइलाज बीमारियों पर राज्य का बड़ा फैसला

कोई असाध्य बीमारी हो जाए, तो अपनी बेहतर देखभाल के लिए स्कूल टीचर एक साल तक की छुट्टी ले सकते हैं, वो भी वेतन सहित। शिक्षकों के लिए ये बड़ा फैसला गोवा सरकार ने लिया है। अब सवाल और मांग उठनी शुरू हो गई है कि क्या ये मेडिकल लीव पॉलिसी देशभर में लागू होनी चाहिए?

सोचिए अगर आपको बीमारी में अपना ख्याल रखने और ट्रीटमेंट कराने के लिए एक साल की छुट्टी मिल जाए। इस दौरान आपको आपकी सैलरी भी मिलती रहे और अन्य फायदे भी। इस छुट्टी का असर न तो आपके प्रमोशन पर पड़े, न पद पर, न ही पेंशन या दूसरी चीजों पर। ये कितनी राहत की बात होगी ना। दिन-रात नौकरी में मेहनत करने वाला हर कर्मचारी अपने नियोक्ता से ऐसी ही सुरक्षा की उम्मीद तो करता है। भारत के ही एक राज्य में सरकार ने स्कूल टीचर्स के लिए ये महत्वपूर्ण फैसला लिया है। शिक्षा निदेशालय गोवा सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूली शिक्षकों के लिए नई मेडिकल लीव पॉलिसी लेकर आई है। हालांकि ये हर बीमारी पर लागू नहीं होगी।

पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार बीते मंगलवार, 10 फरवरी 2026 को इस नई पॉलिसी को लेकर आदेश जारी किया गया। शिक्षा निदेशक शैलेश झेंडे ने आदेश जारी किया। इसके अनुसार, ये नई नीति गोवा, दमन एंड दीव स्कूल एजुकेशन एक्ट 1984 एंड रूल्स 1986 और सेंट्रल सिविल सर्विस (लीव) रूल्स 1972 के प्रावधानों के तहत गवर्न होगी।

स्पेशल मेडिकल लीव पॉलिसी का फायदा किसे फायदा?

  • ये नई अवकाश नीति और इसके नियम उन सभी रेगुलर टीचर्स पर लागू होगी जो गोवा एजुकेशन डायरेक्टरेट के तहत काम करते हैं।
  • जो वहां के गवर्नमेंट स्कूल्स या गवर्नमेंट एडेड स्कूल्स में रेगुलर बेसिस पर नियुक्त हैं।
  • इस जॉब डिस्क्रिप्शन में आने वाले किसी भी टीचर को अगर अपने किसी टर्मिनल इलनेस का पता चलता है, तो वे इस नीति का लाभ ले सकते हैं।

 

गोवा में टीचर्स के लिए नई लीव पॉलिसी क्या है?

  • अगर टीचर किसी लाइलाज बीमारी से ग्रसित हैं, तो वे एक साल (365 दिन) तक का सवैतनिक अवकाश (Paid Leave) ले सकते हैं।
  • इसका असर न तो उनकी पदोन्नति पर होगा, न वरिष्ठता पर। जब छुट्टी के बाद वे वापस ज्वाइन करेंगे, तो उसी पद पर और उन्हीं नियमों के तहत ज्वाइनिंग होगी जो अन्य शिक्षकों पर लागू होगा।
  • रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले पेंशन में भी किसी प्रकार की कटौती नहीं होगी।
  • इस छुट्टी का फायदा लेने के लिए शिक्षक को गोवा मेडिकल कॉलेज द्वारा जारी मेडिकल सर्टिफिकेट और सपोर्टिंग डॉक्यूमेंट्स जमा करने होंगे।
  • इतना ही नहीं, अगर किसी टीचर को एक साल के बाद भी छुट्टी बढ़ाने की जरूरत पड़ती है, तो गवर्नमेंट मेडिकल बोर्ड की सिफारिश और सरकार से मंजूरी मिलने के बाद ये लाभ भी दिया जा सकता है।

 

Terminal Illness में कौन सी बीमारियां कवर होंगी

टर्मिनल इलनेस का मतलब होता है ऐसी बीमारी जिसका ऐसा कोई इलाज नहीं हो सकता, कि वो बीमारी पूरी तरह से ठीक हो जाए। इलाज और देखभाल से उस बीमारी के बढ़ने की गति थोड़ी धीमी की जा सकती है। मरीज को थोड़ा और वक्त मिल सकता है। गोवा की पॉलिसी के तहत ये बीमारियां कवर होंगी-

  • एडवांस्ड कैंसर
  • एंड स्टेज किडनी, लिवर या हार्ट फेलियर
  • एम्योट्रोपिक टैटरल सक्लेरोसिस (ALS)
  • प्रोग्रेसिव न्यूरो-डिजेनेरेटिव डिसॉर्डर

क्या पूरे भारत में लागू होनी चाहिए ऐसी नीति?

गोवा जैसे छोटे से राज्य द्वारा ये बड़ा फैसला लिए जाने के बाद अब बाकी राज्यों को सेवाओं में काम करने वालों के बीच भी सुगबुगाहट होने लगी है। लोग इस फैसले की तारीफ के साथ-साथ अपने लिए भी ऐसी नीति की मांग कर रहे हैं। क्योंकि करियर रिस्क और सैलरी रुकने, पेंशन कटने के डर से इस तरह की बीमारियों में भी कई बार कर्मचारी इलाज शुरू करने में देर कर देते हैं।

गोवा सरकार के इस कदम के बाद बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या पूरे देश में ऐसी नीति तैयार की जानी चाहिए? क्या दूसरे राज्यों को भी अपने कर्मचारियों के हित में इस दिशा में कदम उठाना चाहिए?

एजुकेशन एक्सपर्ट्स का कहना है कि ‘मेडिकल लीव्स के नियम हैं, लेकिन फिर भी देश में ज्यादातर जगहों पर लाइलाज बीमारियों की हालत में इस तरह की लॉन्ग टर्म मेडिकल लीव पॉलिसी को लेकर अच्छे प्रावधानों की कमी है। हालांकि, अगर ऐसी नीति बड़े राज्यों और बड़े स्तर पर लानी है, तो इसके लिए एक गहन समीक्षा और डिटेल स्ट्रक्चर्ड प्लान की जरूरत होगी। क्योंकि देश में लाखों नहीं, करोड़ों की संख्या में गवर्नमेंट टीचर्स और सरकारी कर्मचारी हैं। ये सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि नियम स्पष्ट हों, मेडिकल वेरिफिकेशन पुख्ता हो और इसका गलत इस्तेमाल न हो पाए। यहां एक बड़ा पहलू फंड भी है। लेकिन हां, इस बारे में सोचने और योजना बनाने की जरूरत है।’

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